सरगुजा की आर्द्रभूमि में फिर दिखा भारत के गौरव सारस क्रेन का जोड़ा, जैव विविधता संरक्षण के लिए शुभ संकेत

अंबिकापुर/सरगुजा: छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले से पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक उत्साहजनक खबर सामने आई है। सरगुजा वनमंडल के लखनपुर परिक्षेत्र स्थित कुवांरपुर वेटलैंड कॉम्प्लेक्स में दुनिया के सबसे ऊंचे उड़ने वाले पक्षी और भारत के गौरव सारस क्रेन (Sarus Crane) के एक जोड़े का सफलतापूर्वक अवलोकन किया गया है। वन विभाग ने इसे क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और स्वस्थ आर्द्रभूमि का महत्वपूर्ण संकेत माना है।

वन विभाग के अनुसार यह अवलोकन नियमित मॉनिटरिंग अभियान के दौरान दर्ज किया गया। वनमंडलाधिकारी अभिषेक जोगावत के मार्गदर्शन में तकनीकी सहायक धनीराम और बीट गार्ड राजेंद्र खुजूर लगातार क्षेत्र की निगरानी कर रहे थे। इसी दौरान सारस क्रेन का जोड़ा दिखाई दिया, जिसे वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रिकॉर्ड माना जा रहा है।

स्वस्थ वेटलैंड का संकेत है सारस क्रेन

विशेषज्ञों के अनुसार सारस क्रेन केवल उन आर्द्रभूमियों में निवास करता है जहाँ जल, वनस्पति और जैव विविधता का संतुलन बेहतर होता है। इसलिए किसी भी वेटलैंड में इसकी मौजूदगी उस क्षेत्र के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का प्रमाण मानी जाती है।

छत्तीसगढ़ में सारस क्रेन की संख्या सीमित है। ऐसे में सरगुजा क्षेत्र में इसका नियमित रूप से दिखाई देना संरक्षण प्रयासों की सफलता और प्राकृतिक संसाधनों की बेहतर स्थिति को दर्शाता है।

जीवनभर निभाते हैं एक ही साथी का साथ

सारस क्रेन अपनी अनोखी जीवनशैली के लिए भी जाना जाता है। यह पक्षी जीवनभर एक ही साथी के साथ रहता है। यदि किसी कारण से उसका साथी मर जाए तो दूसरा साथी लंबे समय तक अकेला रह सकता है। भारतीय संस्कृति में सारस क्रेन को प्रेम, विश्वास और अटूट रिश्ते का प्रतीक माना जाता है।

वैज्ञानिक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि

वन विभाग का कहना है कि कुवांरपुर वेटलैंड में दर्ज यह अवलोकन भविष्य में पक्षियों के वैज्ञानिक अध्ययन, आर्द्रभूमि संरक्षण और जैव विविधता प्रबंधन के लिए उपयोगी साबित होगा। इससे सरगुजा क्षेत्र की पारिस्थितिक महत्ता भी और अधिक मजबूत हुई है।

वन विभाग की अपील

वन विभाग ने स्थानीय नागरिकों, प्रकृति प्रेमियों और पक्षी विशेषज्ञों से अपील की है कि यदि उन्हें दुर्लभ पक्षियों का अवलोकन हो तो इसकी सूचना विभाग को दें। इससे वन्यजीव संरक्षण, वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और जैव विविधता संरक्षण के प्रयासों को और मजबूती मिलेगी।

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